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ख़ामोश होंठों से बयाँ

                
                                                         
                            ख़ामोश होंठों से बयाँ
                                                                 
                            
दर्द बेहिसाब होते हैं, सजा बेशुमार होती है,
मोहब्बत अक्सर लफ़्ज़ों में नहीं, ख़ामोश होंठों से बयाँ होती है।
जो छुपकर बहते हैं आँखों से तन्हाई के अंधेरों में,
उन गिरते हुए अश्कों में ही, इश्क़ की असली दास्ताँ होती है।
ज़माने की पाबंदियाँ कभी रोक नहीं पातीं इस एहसास को,
जहाँ नियत सच्ची हो, वफ़ा की नदी वहीं रवाँ होती है।
जहाँ अलफ़ाज़ छोटे पड़ जाएँ दर्द की शिद्दत के आगे,
उसी ख़ामोशी के साए में, मोहब्बत बे-ज़बाँ होती है।
'विक्की' जो हर ज़फ़ा सहकर भी मुस्कुरा दे चाहत में,
उसकी तन्हा रूह ही तो सच्ची मोहब्बत की निगहबाँ होती है।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
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एक घंटा पहले

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