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क़ातिल निगाहें

                
                                                         
                            अदाओं को गुनाहगार कहना ग़लत है,
                                                                 
                            
क़ातिल तो तुम्हारी निगाहें हैं।

लब ख़ामोश रहते हैं अक्सर,
मगर सब कुछ कह जाती निगाहें हैं।

एक मुस्कुराहट पर दिल हार बैठे,
इतनी भी कहाँ बेवफ़ा निगाहें हैं।

न कोई ख़ंजर, न कोई तीर चला,
फिर भी ज़ख़्म दे जाती निगाहें हैं।

जब-जब तुम सामने से गुज़रते हो,
धड़कनों की वजह बन जाती निगाहें हैं।

हुस्न का क्या कसूर, ऐ जान-ए-वफ़ा,
इश्क़ का फ़ैसला सुनाती निगाहें हैं।

जो दिल में छुपा रखा था बरसों से,
उसे पल भर में पढ़ जाती निगाहें हैं।

हमने लाख बचाने की कोशिश की,
मगर हर बार जीत जाती निगाहें हैं।

अब शिकायत भी किससे करें हम,
दिल की सबसे बड़ी गवाह निगाहें हैं।

अदाओं को गुनाहगार कहना ग़लत है,
क़ातिल तो तुम्हारी निगाहें हैं।

— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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