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“इश्क़ था, एहसान नहीं”

                
                                                         
                            तिरी ख़ामोशियों का भी हमें एहसास होता है,
                                                                 
                            
मगर हर दर्द को कहना कहाँ आसान होता है।

तिरे हर एक सितम को मुस्कुरा कर सह लिया हमने,
मगर इतना समझ ले, दिल भी इंसान होता है।

तिरी बेरुख़ी को हमने भी बहुत करीब से देखा,
मगर हर शख़्स इश्क़ में कहाँ हैरान होता है।

निगाहों से पढ़े हैं हमने तिरे बदले हुए मौसम,
हक़ीक़त जानकर भी दिल कहाँ बे-जान होता है।

तू समझे या न समझे, फ़र्क़ अब पड़ता नहीं मुझको,
विक्की का इश्क़ था... कोई एहसान नहीं होता है।

- विकास त्रिपाठी “विक्की”
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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