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दुआ कबूल हुई

                
                                                         
                            जो दुआ माँगी थी रब से मैंने, वो कबूल हुई,
                                                                 
                            
तुम मिल गए मुझे, मेरी हर आरज़ू पूरी हुई।
तेरे आने से ज़िंदगी में रौशनी उतर आई,
सूनी पड़ी हर राह भी फिर से हसीं हुई।
मेरे लबों की हर हँसी का सबब बने हो तुम,
मेरे दिल की हर धड़कन तुमसे ही रूबरू हुई।
जो ख़्वाब बरसों से मेरी पलकों पर ठहरे थे,
तेरी एक मुस्कान से उनकी भी शुरुआत हुई।
अब न कोई शिकवा रहा, न कोई गिला रहा,
तेरे साथ हर दर्द की भी नई जुस्तजू हुई।
रब ने जब भी मेरी तक़दीर की किताब लिखी,
हर सफ़े पर बस तेरे नाम की ही आरज़ू हुई।
मैंने और कुछ भी नहीं माँगा अपनी दुआओँ में,
बस तेरी मोहब्बत मिली, और ज़िंदगी मुकम्मल हुई।
जो दुआ माँगी थी रब से मैंने, वो कबूल हुई,
तुम मिल गए मुझे, मेरी हर आरज़ू पूरी हुई।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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