जिनके साथ बचपन गुज़रा, नादानियाँ गुज़रीं,
मिट्टी में खेलते-खेलते ज़िंदगी की पहली कहानियाँ गुज़रीं।
वक़्त ने सबको अपनी-अपनी मंज़िलों की ओर भेज दिया,
पर यादों की गली आज भी वहीं ठहरी हुई है।
तुम सब जहाँ भी हो, खुश रहो, आबाद रहो।
अगर कभी ज़िंदगी की भागदौड़ से थोड़ा-सा वक़्त मिले,
तो एक बार फिर उसी पुराने अंदाज़ में मिल बैठेंगे...
न कोई पद होगा, न पहचान, न दुनियादारी का हिसाब—
बस वही बचपन, वही ठहाके, वही अपनापन और वही दोस्ती।
क्योंकि कुछ रिश्ते उम्र के साथ पुराने नहीं होते,
बल्कि हर गुज़रते साल के साथ और भी कीमती हो जाते हैं।
तुम सब मेरी ज़िंदगी का वह ख़ूबसूरत हिस्सा हो,
जिसे समय कभी मुझसे छीन नहीं सकता।
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