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दिल के कोने में

                
                                                         
                            दिल के कोने में दबी रह गई यार कुछ तो,
                                                                 
                            
अधूरी सी रह गई अपनी कहानी और प्यार कुछ तो।
रास्ते तो मिले पर मंज़िल तक पहुँचे ही नहीं,
बीच में ही छूट गया हाथ और इंतज़ार कुछ तो।
सोचा था बोलेंगे सब कुछ पर मुँह बंद ही रहा,
अंदर ही अंदर घुटता रहा ये गुबार कुछ तो।
तू अपनी दुनिया में मस्त, हम यहाँ अकेले पड़े,
दे ही गई तेरी यादें ये दर्द हज़ार कुछ तो।
कसम से, चाहा तो बहुत था तुझे पाना हमने,
पर किस्मत भी कर गई खेल ऐन वक़्त पर गद्दार कुछ तो।
रात होते ही पुरानी बातें दिमाग़ में घूमती हैं,
कमबख्त तन्हाई भी करती है अब अत्याचार कुछ तो।
तेरे बिना भी कट रही है ज़िन्दगी किसी तरह,
पर दिल के किसी कोने में है वो बुखार कुछ तो।
कोई पूछता है हाल तो कह देते हैं—'सब बढ़िया',
पर चेहरे के पीछे छुपा है झूठा ये नक़ाब कुछ तो।
अरे भाड़ में जाए ये अंजाम, पर मोहब्बत तो सच्ची थी,
दे ही गई ये अधूरी आशिक़ी भी ख़ुमार कुछ तो।
अब तो बस यादों के सहारे ही बोतल खुलेगी,
'विकास' भी लिखेगा अपनी ये दास्तान-ए-ज़ार कुछ तो!
- विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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