पुरुष पुरुषार्थ खो दे क्या बचेगा?
ऋषि परमार्थ खो दे क्या बचेगा?
तपस्वी त्याग तप खो दे,
जो दरिया धार खो दे,
समंदर खो दे गहराई,
कलम जो सार खो दे,
तो रह जाएगा थोथा, बांटने को बीनने को,
नजाकत वक्त अपनी मार खो दे क्या बचेगा?
जो ईश्वर सृष्टि खो दे,
व सृजन संहार खो दे,
जो रण में योद्धा भी,
जीत खो दे, हार खो दे,
शिशु जो खो दे निश्छल मन,
जो खो दे सेठ अपना धन,
जकड़कर जुल्म की जंजीर में,
निर्दोष अपना तन,
भवन का देवता ही गर भवन से रूठ जाए,
प्रजापालन अगर सरकार खो दे क्या बचेगा?
पपीहा 'पी कहाँ' खो दे,
जो कोयल 'कूक' खो दे,
कबूतर खो दे 'गुटरू गूॅं'
कवि जो 'हूक' खो दे,
जो चातक 'प्यास' खो दे,
तन जो अपनी 'सांस' खो दे,
जो उम्मीदों में अब भी जी रहा हो,
'आस' खो दे,
जो मॉं ममता की गहराई, समन्दर खार खो दे,
गृहस्थी ही अगर घर बार खो दे क्या बचेगा?
जो नारी अस्मिता खो दे,
व निज शृंगार खो दे,
जो पंक्षी नीड को अपनी,
शजर की डार खो दे,
तड़फकर टूटकर,
कोमल ह्रदय जो प्यार खो दे,
शिशु के वास्ते इक माँ,
जो पय की धार खो दे,
वहन करता है फन पर जो, समूची इस धरा को,
वही गर इस धरा का भार खो दे क्या बचेगा?
- विकास उपाध्याय 'वैभव'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X