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ए सोने वाले अब तुझको हरारत की ज़रूरत है

                
                                                         
                            ए सोने वाले अब तुझको हरारत की ज़रूरत है
                                                                 
                            
सितमगर चढ़ गया सर पर बग़ावत की ज़रूरत है

सभी मुनसिफ़ बिके हैं ख़ुद उठो इंसाफ़ पाने को
उन्हें कह दो जो कहते हैं अदालत की ज़रूरत है

हमें बस अपने हिस्से के निवाले दे दिये जायें
न मसनद की ज़रूरत है न दौलत की ज़रूरत है

अंधेरों के ज़माने में उगाने को कोई सूरज
हज़ारों ही चिराग़ों की शहादत की ज़रूरत है

शिवाले कर लिये हमने बहुत सी मस्जिदें कर ली
हमारे शहर में अब तो मुहब्बत की ज़रूरत है

बड़े ख़ामोश रहते हैं असूलों पर जो चलते हैं
कोई तो बड़बड़ाये कुछ शरारत की ज़रूरत है

नहीं सुनता नहीं अब देखता है कुछ निज़ाम अपना
पुरानी सोच की अब तो मुरम्मत की ज़रूरत है
-विजय वाजिद
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3 महीने पहले

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