ना जाने कहाँ खो गया दुनियाँ मे आदमी।
कि आदमी को ढूंढता है यहाँ आदमी ।।
दुनियाँ की भीड़ में भी तन्हाँ घूमता है ।
मतलब से ही हाथ मिलाता है आदमी ।।
क्या बो दिया था ऐसा जो ये फसलें उग गई ।
के आदमी को काटता है यहाँ आदमी ।।
जो कहते थे हम ढूंढ के लायेंगे आदमी ।
बन ना सके पहले वो खुद ही आदमी।।
~ विजय रस्तोगी
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