मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’
तुम जवान हो या बूढ़े,
बदसूरत हो या राजसी,
दुबले-पतले, मोटे, छोटे,
गंजे हो या पूरे शरीर पर बालों वाले,
भालू जैसे या बंदर जैसे…
नाक टेढ़ी, चेहरा चपटा, सुंदर,
काले, गोरे, लंबे,
जैसे भी हो तुम…
तुम्हें थामे रहती हैं जीवन भर
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’।
तुम्हें बुखार हो,
या हार्ट अटैक,
दस्त हो या उल्टियाँ,
धूप लगे या चक्कर आए…
जो हालत हो उसमें दौड़ती-भागती हैं,
साड़ी ऊपर खोंसकर नंगे पाँव,
मदद माँगने या डॉक्टर बुलाने,
जद्दोजहद करती हैं
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’।
“तुम एक नंबर के निकम्मे हो,
नालायक हो,
कुछ समझ नहीं आता तुम्हें,
अक्ल मत सिखाओ,
न ही ताने मारो…
दिनभर सोते हो आलसी,”
जितना डाँटते हो, सहती हैं,
कभी लात, कभी मुक्के,
फिर भी
तुम्हें छोड़ती नहीं,
जोंक की तरह चिपकी रहती हैं
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’।
तुम ऑफिस से चिढ़कर आओ,
या मजदूरी से थककर,
शराब पीकर या गांजा फूँककर,
अफीम, चरस, ड्रग्स, सिगरेट,
या बीड़ी पीकर,
तुम्हारी सेवा के लिए तैयार रहती हैं,
रात हो, देर रात हो, दिन हो,
पैर फैलाकर बिस्तर बन जाती हैं
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’।
थक जाती हैं, टूट जाती हैं,
घिस-घिसकर पतली हो जाती हैं,
हज़ार बार मर जाती हैं, फिर भी
तुम्हारे नाम की सौभाग्यवती बनी,
जीवनभर दिखाती रहती हैं
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’।
तुम उनसे प्यार करो,
या न करो,
बाहर अफेयर करो या झगड़ा,
वक्त-बेवक्त बाहर जाओ,
बताकर जाओ या न बताओ,
तुम्हारा घर अडिग रहेगा,
और संसार सुचारु…
उपमा, साँजा, पोहा का नाश्ता,
बिना चूक के मिलता रहेगा,
दो वक्त का खाना,
चटनी, सलाद, अचार, पापड़,
त्योहार, मेहमाननवाजी, शुद्ध घी,
इडली, ढोकला, डोसा घर का,
शेवई, कुरडई, वडी, सांडगे,
सालों-साल,
चिंता करने की कोई बात नहीं…
व्यवस्था ने इन्हें हमेशा तुम्हारे पैरों से बाँध रखा है
‘मूर्ख अड़ियल पागल औरतें’।
- सारिका उबाले
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