ज्ञानदेव जब चले गए—
ढह गई वह दीवार,
वेद भटक गए बीहड़ों में,
संत हो गए हतप्रभ-व्याकुल।
ज्ञानदेव जब चले गए—
सूख गई इंद्रायणी,
मराठी के बरगद तले
जल भी सुलगने लगा।
ज्ञानदेव जब चले गए—
टूट गए निवृत्तिनाथ भी,
आँसुओं के अतल कुंड में
बुझने लगी जीवन-ज्योति।
ज्ञानदेव जब चले गए—
विट्ठल की ईंट दरक गई,
स्वामी 'बाप-रखुमादेवीवर' भी
कमर से झुक गए दुख में।
ज्ञानदेव जब चले गए—
बेबस-अकेला रह गया नामा,
एक-एक कर सब भाई-बहन भी
चले गए निजधाम।
मेरे ज्ञानराजा! वह मर्म
आज समझ में आया,
कि भरी दोपहर में ही कैसे
ढल आई गहरी सांझ।
उस समय की भाँति ही फिर से
बावरा हो उठा मोगरा,
धरती भर बिछ गईं कलियाँ,
छूट गया सब आसरा।
यहाँ आलंदी में अब तो
बस छाती फटती है,
पंढरी के मार्ग में भी
बिछ गए बबूल के काँटे।
इन कलियों की महक भी
प्राणों का फंदा बन गई,
अब यह एकाकी प्रवास है—
उदास... केवल उदास।
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