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विवाह का वास्तविक उद्देश्य

                
                                                         
                            न केवल सात फेरे लेना, न केवल अग्नि को साक्षी मान। विवाह तो वह पावन यात्रा, जहाँ "मैं" बन जाता है "हम" का गान।
                                                                 
                            
न केवल तन का संगम होता, मन का भी होता है मिलन। दो संस्कारों, दो परिवारों का, होता है मधुर समर्पण।
ईश्वर ने जब नर-नारी को, जीवन का साथी बनाया। एक में शक्ति, एक में करुणा, दोनों से जग को सजाया।
पति यदि वृक्ष बनकर ठहरे, पत्नी उसकी छाया बने। पत्नी यदि दीपक बन जाए, पति उसका विश्वास बने।
जीवन केवल सुख का सागर, ऐसा भ्रम मत पालो तुम। दुख की धूप, संघर्षों की वर्षा, दोनों मिलकर झेलो तुम।
विवाह नहीं अधिकारों की, हर दिन नई अदालत है। यह तो प्रेम, धैर्य और क्षमा की, जीवन भर की इबादत है।
जहाँ जीत किसी एक की हो, वहाँ हार भी जन्म लेती है। जहाँ दोनों साथ झुक जाते, वहीं गृहस्थी स्वर्ग बनती है।
बच्चे केवल जन्म न लें, चरित्र भी उनका जन्मे। घर केवल ईंटों से न बने, आदर्शों से उसका कर्म जगे।
धन हो तो विनम्रता आए, दुःख हो तो साहस जागे। ऐसा घर ही मंदिर बनता, जहाँ प्रेम का दीपक लागे।
विवाह का अंतिम उद्देश्य, केवल वंश बढ़ाना नहीं। एक-दूजे को श्रेष्ठ बनाकर, मानवता को सजाना सही।
जब पति-पत्नी एक-दूसरे में, ईश्वर का ही रूप निहारें। तब हर दिन पूजा बन जाए, हर श्वास बने मधुर पुकारें।
यही विवाह का सत्य स्वरूप, यही जीवन का श्रेष्ठ विधान। दो आत्माओं का ऐसा संग, जो पहुँचा दे परमात्मा के धाम।
 
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2 महीने पहले

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