मैं मंज़िल ख़रीद लूँ, अपना हुनर बेच दूँ,
चलो आज अपनी मेहनत का भी असर बेच दूँ।
जो लिखता हूँ दिल से, वो अल्फ़ाज़ बेच दूँ,
तुम्हें चाहिए शोहरत, तो अपने जज़्बात बेच दूँ।
जो बचपन में देखे थे, वो ख़्वाब बेच दूँ,
चंद सिक्कों के ख़ातिर क्या अपना ईमान बेच दूँ।
अगर बिकने से मिलती है दुनिया की बादशाहत,
तो बोलो, क्या मैं अपनी पहचान बेच दूँ।
मैं फ़क़ीर सही, मगर ज़मीर ज़िंदा है मेरा,
तुम्हारी दौलत के ख़ातिर क्या अपना किरदार बेच दूँ।
- विजय बिंदास राजा
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