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क्या सच में देश बढ़ रहा है?

                
                                                         
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क्या सच में
देश बढ़ रहा है?
क्या सच में आज शिक्षा
जीवनशैली को संवार रही है?

आज
वाणी में मधुरता नहीं,
शब्दों में सभ्यता नहीं,
संस्कारों में दृढ़ता नहीं,
विचारों में शुद्धता नहीं।
बड़ों के प्रति सम्मान नहीं,
न ही कोई मर्यादा शेष रही।
जीवन को जीवन नहीं,
एक कारोबार बना डाला।
मिली हुई आज़ादी के नशे में,
स्वयं के जीवन को दाँव पर लगा डाला।

कैसे समझाएँ इन्हें?

आग की तपिश का एहसास
दूर से ही कर लेना बेहतर होता है,
क्योंकि उसे छूने के प्रयास में
अक्सर जलना पड़ता है।

कामयाबी का सफ़र
मेहनत की लगाम से तय होता है।
हक़ की लड़ाई में उलझने वाले
अक्सर सपनों में भी
अपनी मंज़िल से दूर हो जाते हैं।

देश तभी सच में आगे बढ़ेगा,
जब शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहेगी,
बल्कि चरित्र,संस्कार और कर्तव्य का आधार बनेगी।
तभी विकास केवल आँकड़ों में नहीं,
व्यवहार और आचरण में भी दिखाई देगा।
-वन्दना सूद
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2 महीने पहले

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