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कंधे की तलाश

                
                                                         
                            आदमी जब तक पूरी तरह टूट न जाए,
                                                                 
                            
किसी नए कंधे की तलाश करता रहता है

अपने मन की व्यथा सुनाते हुए, धीरे से कहता है—
"सिर्फ तुमसे कह रहा हूं, किसी और से मत कहना..."

उसे हर बार की तरह यक़ीन होता है
कि उसके शब्द सुरक्षित रहेंगे
यहीं से शुरू होता है
एक और भरोसे का सफ़र,
जो अक्सर वहीं जाकर रुकता है,
जहां उसकी निजी पीड़ाएं
किस्सों में बदल जाती हैं,
और उसके गहरे घाव
महफ़िलों की चर्चा में

तब उसे समझ में आता है कि
इस दुनिया में सबसे सस्ता
अक्सर किसी और का दुःख होता है
लोग उसे सुनते हैं हमदर्दी से
और सुनाते दिलचस्पी से।

-- वेद प्रकाश तिवारी
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3 महीने पहले

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