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चौकीदार

                
                                                         
                            फ़ैसले अक्सर
                                                                 
                            
अपराध से नहीं,
समय से हार जाते हैं
तभी तो
चलता रहता है,
चोर-सिपाही का यह पुराना खेल

एक भागता है,
दूसरा पीछा करता दिखाई देता है
दोनों के बीच का फासला
कभी इतना नहीं होता कि
चोर पकड़ा जाए,
और कभी इतना भी नहीं
कि लोगों का विश्वास उठ जाए

सच तो बरसों तक
फ़ाइलों की तहों में,
बस सांस लेता रहता है
इधर अपराध अपना चेहरा बदलता है,
उधर न्याय अपनी तारीख़

चोर बदलते हैं,
सिपाही बदलते हैं,
मगर यह व्यवस्था का खेल
कभी नहीं बदलता।

-- वेद प्रकाश तिवारी
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3 महीने पहले

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