रात के सन्नाटे में,
जब चौकीदार लगाता है आवाज़-
“ जागते रहो !”
तब चौकीदार को लगता है कि
पूरा शहर जाग रहा है,
और लोगों को भरोसा रहता है कि कोई पहरा दे रहा है
ऐसी स्थिति में
सुरक्षा बस एक वहम बनकर रह जाती है
हमारा जीवन भी तो कुछ ऐसा ही है,
हम सच से ज़्यादा
दिखावे पर भरोसा करते हैं
औपचारिक रिश्ते,
कागज़ी सुरक्षा
और खोखली व्यस्तताएं
इनके सहारे
हम गहरी नींद में सोए रहते हैं,
जबकि जागती रहती हैं
सिर्फ़ बातें और दावे ।
-- वेद प्रकाश तिवारी
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