सात मिलियन लोगों के भी
सपने रहे होंगे
हमारी ही तरह,
बहुत बड़े
जो कोविड महामारी में
मौत के मुंह में समा गए,
जो अस्पतालों में
अधूरी सांसों के साथ
अपनों को छोड़ गए,
जो विमान दुर्घटनाओं में
जीवित ही जल गए,
जो नाव दुर्घटनाओं में
जल की गोद में
हमेशा के लिए सो गए,
जो भूकंप के मलबे तले
दब गए,
और जो हर दिन
किसी न किसी हादसे में
अचानक चले जाते हैं
सपनों की ऊंचाई
मृत्यु ने कभी नहीं नापी
फिर भी
हम हर रोज
अपने क़द,
अपने पद
और अपने अहंकार की
माप लेते फिरते हैं
जब अगला क्षण भी
हमारे अधिकार में नहीं,
तो यह अभिमान कैसा ?
आओ,
एक-दूसरे को छोटा करने के बजाय,
अपने होने का
थोड़ा-सा बेहतर हिस्सा
हर दिन
मानवता के नाम करते चलें ।
-- वेद प्रकाश तिवारी
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