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पर वहां बह रहा अपनेपन का

                
                                                         
                            असंपृक्त निष्प्रता से युक्त,
                                                                 
                            
कहता जा तू कंठमुक्त,
तेरी भाषा ओजस्विता से भरी है,
मिलेगा सबको यहां संयुक्त,
एकता में अनेकता,
शत्रु बहुत नहीं है यहां बुरे,
सबका आसमान है एक,
पर लगा रखे है अपने अपने पहरे,
लघुता में ही है महानता,
ये दर्प तो एक संताप है,
रह गया यहां हर कोई अकेला,
पर वहां बह रहा अपनेपन का
सैलाब है।
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2 घंटे पहले

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