घाटियों पर सोया एक विशाल प्रपात,
शीतल चांदनी में अब गिरने को तैयार,
क्योंकि पीछे से एक विशाल नदी
पूरे वेग से बहती हुई आ रही है,
इसको किसी ने अब तक हिलाया नहीं,
व स्वयं भी इसने खुद को जगाया नहीं,
जब ये गिरेगा, तो यहां बहुत कुछ आकार लेगा,
अपने इस प्रपाती पर्दे के पीछे एक संसार दिखाएगा,
ये गिरता प्रपात पर्दा, अब तक की सब,
इंसानी गलतिया को भी अपने पीछे छिपा लेगा,
और नव जागरण के साथ,
थके हारे मांदे इंसान को आगे बढ़ने को कहेगा,
फिर प्रपाती पर्दे पर दिखेगी इस विकट
जीवन की जिजीविषा,
अभिलाषा, आत्ममुग्धता, अपनापन,
ममता, करुणा, मातृत्व, पितृत्व,
और कभी नहीं हार मानने वाला जज्बा।
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