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घनतुर्य बज उठे

                
                                                         
                            घनतुर्य बज उठे, घनघोर घटाए छा गई,
                                                                 
                            
गामा कड़कड़ाती तड़क उठी,
तो धरती थोड़ा सा कांपी,
अब अपने ही दल दल में है फंसी हुई,
कैसे वो आसमानी आफत को मोल ले,
किधर जाये किधर जाये, है सोच रही,
अगर आज गिर ही पड़ी ये बला,
तो मचेगा विनाश का जलजला,
खुद को बचाती, खुद को छिपाती,
आज आसमान से है गुहार लगाती,
क्या आसमान धरती की पीड़ा सुनेगा,
या वो धरती पर कहर मचा कर ही रहेगा।
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3 घंटे पहले

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