दनुज का यहां कोई रूप नहीं,
ये तो वैसे ही हर चेहरे पर दिख जाता है,
तुम बनाते तो यहाँ तरह तरह के मुखौटे,
ये तो बस चेहरा ढंका करता है,
क्या कभी किसी पीड़ा पंहुचाने वाले को,
किसी अलग मुखौटे में देखा है किसी ने,
उसे तो उस चेहरे से बस नफरत हो जाती है,
व वो फिर चेहरा यहां दनुज बन जाता है।
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