अपने मन की दीवारों पर,
टाँग रखे हैं मैंने अपने चेहरे सारे;
सारे के सारे चेहरे नंगे रक्खे हैं,
कोई नहीं पैबंद है इनमें,
कोई नहीं पर्दादारी है।
हर चेहरे को नज़र गड़ा कर,
हैरानी से,
उलट-पलट कर देख रहा हूँ,
भीतर-भीतर सोच रहा हूँ:
कौन सा चेहरा इनमें से मेरा अपना है?
अपना—यानी जो मैं ख़ुद हूँ,
जैसा भी हूँ;
क्या सारे के सारे चेहरे ही मेरे अपने चेहरे हैं?
अगर ये सारे ही चेहरे मेरे अपने हैं,
तो फिर इनमें
कौन सा चेहरा सच्चा है?
जिसके होने से
मेरा होना 'होना' है।
कौन सा चेहरा ऐसा है जो झूठा है,
पर लोगों को सच्चा लगता है
और मुझको ठगता रहता है?
कौन सा चेहरा है वो जो इस ठगने पर ख़ुश होता है,
कभी-कभी इतराता भी है,
कभी-कभी झुँझलाता भी।
कौन सा चेहरा है वो जो इस ठगने पर कुम्हलाता है,
सिसक-सिसक अंदर-अंदर रो भी देता है।
मैं तो एक हूँ,
फिर मेरे इतने चेहरे?
वो भी जाने कैसे-कैसे...
इस हद तक गिरे हुए हैं कुछ,
कहने में जीभ उलझती है;
इस हद तक उठे हुए हैं कुछ,
कहना झूठा सा लगता है।
इन सब बातों से ये तय है:
झूठा-सच्चा जैसा भी है,
हर चेहरा मेरा अपना है।
हर चेहरे में थोड़ा-थोड़ा मैं ज़िन्दा हूँ,
हर चेहरे पर थोड़ा-थोड़ा शर्मिन्दा हूँ।
- विशाल ओझा 'एहसास
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