बेपनाह मोहब्बत करती थी तू ,
और मैंने कभी जाना ही नहीं I
खामोश थीं तेरी निगाहें और लब,
पर मैंने कभी तुझे समझा ही नहीं ।।
तेरी जुबां पर बस मेरा ही नाम था,
मैंने कभी तेरी ओर देखा ही नहीं।
तेरी हर मुस्कान में छिपे हुए दर्द को,
कभी मैने दिल से पहचाना ही नहीं ।।
हर एक खुशी में तूने मुझे ही ढूँढ़ा,
हर दुआ में मुझे ही कबूल किया।
मैं अपनी दुनिया में इतना खोया
कि तेरे दिल को नजर अंदाज किया।।
जब भी मैं रूठा, तूने प्यार से मनाया,
तूने हर गलती को मुस्कुराकर भुलाया।
तेरे सब्र को मजबूरी समझ लिया मैने,
तेरे इजहार को अपना नहीं बना पाया।।
जिसे हमने बाद में अपना समझा,
वही एक दिन हमसे दूर चली गई ।
अब भी तेरी हँसी कानों में गूँजती है,
तेरी सब बीती बातें दिल में उतर गई ।।
तेरी मोहब्बत सच्ची और बेइंतहा थी,
मैं उसे फकत एक कहानी समझ बैठा ।
तू ताउम्र मेरी होकर याद में जीती रही,
मैं तुझे हर पल पराया ही समझ बैठा।।
आज मेरी दुआ बस इतनी-सी है,
जहाँ भी रहो हमेशा मुस्कुराते रहना।
अगर मेरी वजह से कभी आँसूआए
तो उन्हें वक्त के हवाले कर देना।।
अगर किस्मत मुझे एक मौका और दे,
तो हर लम्हा हर खुशी तेरे नाम कर दे।
तेरी उस खामोश मोहब्बत को पढकर,
विमल तेरे ग़मों को अपने नाम कर दे ।
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