आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेपनाह प्यार

                
                                                         
                            बेपनाह मोहब्बत करती थी तू ,
                                                                 
                            
और मैंने कभी जाना ही नहीं I
खामोश थीं तेरी निगाहें और लब,
पर मैंने कभी तुझे समझा ही नहीं ।।

तेरी जुबां पर बस मेरा ही नाम था,
मैंने कभी तेरी ओर देखा ही नहीं।
तेरी हर मुस्कान में छिपे हुए दर्द को,
कभी मैने दिल से पहचाना ही नहीं ।।

हर एक खुशी में तूने मुझे ही ढूँढ़ा,
हर दुआ में मुझे ही कबूल किया।
मैं अपनी दुनिया में इतना खोया
कि तेरे दिल को नजर अंदाज किया।।

जब भी मैं रूठा, तूने प्यार से मनाया,
तूने हर गलती को मुस्कुराकर भुलाया।
तेरे सब्र को मजबूरी समझ लिया मैने,
तेरे इजहार को अपना नहीं बना पाया।।

जिसे हमने बाद में अपना समझा,
वही एक दिन हमसे दूर चली गई ।
अब भी तेरी हँसी कानों में गूँजती है,
तेरी सब बीती बातें दिल में उतर गई ।।

तेरी मोहब्बत सच्ची और बेइंतहा थी,
मैं उसे फकत एक कहानी समझ बैठा ।
तू ताउम्र मेरी होकर याद में जीती रही,
मैं तुझे हर पल पराया ही समझ बैठा।।

आज मेरी दुआ बस इतनी-सी है,
जहाँ भी रहो हमेशा मुस्कुराते रहना।
अगर मेरी वजह से कभी आँसूआए
तो उन्हें वक्त के हवाले कर देना।।

अगर किस्मत मुझे एक मौका और दे,
तो हर लम्हा हर खुशी तेरे नाम कर दे।
तेरी उस खामोश मोहब्बत को पढकर,
विमल तेरे ग़मों को अपने नाम कर दे ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर