आईं गंउवा लखीं हमार।
कटहर बड़हर गाछ गम्हार।
खेती-बाड़ी अउर ईनार।
गईआ-बाछी घर पिछुआर।
बरहम बाबा-काली माई।
सती दाई-जोगनी मांई।
छठी मईआ-छोटका पूल।
बगल में एकरा छोट स्कूल।
दर-दलान आ खेत-खलिहान।
ईंहवे होखे सांझ-बिहान ।
कुछ दूरी पर मोड़-बाजार ।
लगे शनिचर भीड़ अपार।
वातावरण सुखद हरियाली।
फल से लदरल डाली-डाली।
ठण्ढी हवा बहे सुखदाई।
उठीं सबेरे देखीं भाई।
कोयल कूके चिरई बोले।
कनवा में ज्यूं मिसिरी घोलें।
प्रात बेला में जगे किसान ।
मेहनत से उपजावे धान।
गेहूं, रागी, गन्ना, छोला ।
दलहन अलसी इहवें होला।
आंख उठा के देखीं कतहीं।
जड़ी-बूटी ह पतई-पतई।
गांव कीमती हमर बड़ा बा।
एहि प मानी देश खड़ा बा।
गांव पूरा लागे परिवार ।
सरग से सुन्दर 'गांव हमार'।
-विजय कुमार पाण्डेय 'प्यासा'
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