आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गांव हमार (भोजपुरी)

                
                                                         
                            आईं गंउवा लखीं हमार।
                                                                 
                            
कटहर बड़हर गाछ गम्हार।
खेती-बाड़ी अउर ईनार।
गईआ-बाछी घर पिछुआर।

बरहम बाबा-काली माई।
सती दाई-जोगनी मांई।
छठी मईआ-छोटका पूल।
बगल में एकरा छोट स्कूल।

दर-दलान आ खेत-खलिहान।
ईंहवे होखे सांझ-बिहान ।
कुछ दूरी पर मोड़-बाजार ।
लगे शनिचर भीड़ अपार।

वातावरण सुखद हरियाली।
फल से लदरल डाली-डाली।
ठण्ढी हवा बहे सुखदाई।
उठीं सबेरे देखीं भाई।

कोयल कूके चिरई बोले।
कनवा में ज्यूं मिसिरी घोलें।
प्रात बेला में जगे किसान ।
मेहनत से उपजावे धान।

गेहूं, रागी, गन्ना, छोला ।
दलहन अलसी इहवें होला।
आंख उठा के देखीं कतहीं।
जड़ी-बूटी ह पतई-पतई।

गांव कीमती हमर बड़ा बा।
एहि प मानी देश खड़ा बा।
गांव पूरा लागे परिवार ।
सरग से सुन्दर 'गांव हमार'।
-विजय कुमार पाण्डेय 'प्यासा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर