आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रण जीवन हा लड़ के समझीं।

                
                                                         
                            डर में न रहीं डर दूर रखीं।
                                                                 
                            
हिय साहस से भरपूर रखीं।
तन के मन के मजबूत रखीं।
बल ज्ञान सदा भरपूर रखीं।
नित चाल विनम्र सहूर रखी।
डर में न रहीं डर दूर रखीं।

कर जोड़ रहीं विनयी बन के।
सद पूत बनी घर के अपने।
पढ़ के लिख के निज राह गढ़ीं।
कर दूर चलीं दुविधा मन के ।
अइसे मन मे कुछ लूर रखीं ।
डर में न रहीं डर दूर रखीं।

पल से कर प्यार चले जन जे।
पल धार बुझे समझे पल के।
पल के उपयोग सदा यश दे।
सुधि लोग कहे महिमा पल के।
पल ध्यान सदा भरपूर रखीं।
डर में न रहीं डर दूर रखीं।

रण जीवन हा लड़ के समझीं।
दम बा त सुनीं पड़ के समझीं।
गिरि हा इह पे चढ़ के समझीं।
पथ जीवन के गड़ के समझीं।
जगमें खुद के मशहूर रखीं।
डर में न रहीं डर दूर रखीं।
हिय साहस से भरपूर रखीं।

-विजय कुमार पाण्डेय 'प्यासा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर