आ जाना मेरी कब्र पर,
मेरा आफ़ताब बाकी है;
गुलदस्तों से सजा होगा श्मशान,
पर तेरे हाथों का गुलाब बाकी है।
रख देना प्यार से
फूल मेरी लाश पे सिसकते,
देख लाशें भी मेरी कब्र को कहें—
काश हम इस तरह महकते।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X