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बे-तासीर

                
                                                         
                            मुद्दतों के भरोसे ख़ुदा से, क्या तासीर माँगूँ मैं,
                                                                 
                            
न वो सुनता है मेरी, न उसे कोई परवाह है;
मैंने तो सिर्फ़ तुझे माँगा था हर एक दुआ में,
और उस ख़ुदा ने मेरे हर सजदे को बे-असर किया है।

हम माँगते रहे तुझे अपनी हर एक साँस में,
उसने ख़ामोश रह कर मेरी आस तोड़ दी;
ज़माने से क्या गिला करें अब अपनी तबाही का,
जब आसमान वाले ने ही मेरी इल्तिज़ा मोड़ दी।

हाथों से शब लहू रिस गया इल्तिज़ा करते-करते,
पर उस रज़ा वाले ने कोई मुअजिज़ा न दिखाया;
हमने तो उसके एक इशारे पर दुनिया छोड़ दी थी,
और उसने हमें ही अपनी रज़ा से महरूम बताया।

शिकस्त साफ़ है मेरी, अब जीत की आस क्या रखूँ,
जब मेरी ही लकीरों ने मेरा साथ छोड़ दिया;
जिसे रो-रो कर माँगा था हर एक शब-ए-ग़म में,
उसी ने आके मेरे सब्र का आफ़्ताब तोड़ दिया।
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एक दिन पहले

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