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इंसान का खोना

                
                                                         
                            इंसान
                                                                 
                            
एकदिन में नहीं खोता है।
पहले वह खौलता है,
फिर कम बोलता है।
अक्सर मौन रहता है,
भीड़ में गौण रहता है।
ऊपर से मुस्कुराता है,
अंदर अंदर रोता है।
वह एकदिन में नहीं खोता है।।
पहले उसकी उम्मीदें होती हैं कम,
अनवरत पीता है ग़म।
न कोई सम्मान ; न अभिमान,
न कोई लोभ ; न किसी से क्षोभ।
उसे न गुस्सा आता है न क्रोध,
न कोई शिकायत ; न प्रतिशोध।
उसे नहीं सताती अपनों की याद,
उसकी नहीं रहती कोई फरियाद।
तब इंसान बेफ़िक्र होता है,
फिर गहरी नींद में सोता है।
इंसान
एकदिन में नहीं खोता है।।

 
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22 घंटे पहले

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