आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रातें उसका पता जानती हैं।

                
                                                         
                            रातें उसका पता जानती हैं।
                                                                 
                            
दिन का शहर उसे नहीं पहचानता।

चेहरे हर दिन बदल जाते हैं;
लेकिन आँखों की प्यास वही रहती है।

उसने अपना नाम कई बार बदला है,
केवल माँ के मुख से ही उसके बचपन का नाम उच्चारित होता है...

शहर हर दिन अपनी नैतिकता के कपड़े धोता रहता है;
लेकिन नाले का पानी लाल नहीं होता।

जो लोग उस पर उँगली उठाते हैं,
वही उँगलियाँ रात को उसके दरवाज़े पर दस्तक देती हैं।

उसके कमरे में
एक आईने के अलावा कोई दूसरा साक्षी नहीं है।

आईना हर दिन
एक स्त्री को थोड़ा-थोड़ा शहर बनते हुए देखता है।

कितने हाथ उसके शरीर पर पड़े, उसका हिसाब वह नहीं रखती।
लेकिन हर हाथ का एक अलग भय था— अपने ही भीतर लौट न पाने का।

उसने कभी प्रेम नहीं बेचा।
प्रेम बेचने की वस्तु नहीं है।
बेचा है समय, अपमान, अनिद्रा
और अपना जीवन थोड़ा-थोड़ा करके...

शहर हर दिन उसे अशुद्ध कहता है।
लेकिन वही शहर हर रात अपने पापों को उसके कमरे में जूते उतारकर छोड़ जाता है।

सुबह होने पर उसके कमरे में
दरवाज़े के नीचे से
धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा भीतर आता है।
धूप उससे कोई प्रश्न नहीं पूछती।
संभवतः प्रकाश ही एकमात्र ऐसी चीज़ है,
जो मनुष्य को उसके पेशे के अनुसार नहीं पहचानती।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर