क्या धर्म में, क्या कर्म में,
ज्ञात छुपा है मर्म में।
जो ज्ञात है वह स्यात् है,
सर्वस्व अब देवात है।
जहां देव हैं, वहां वेद है,
जहां वेद तहां ज्ञान।
ज्ञान का है पुंज जहां,
वहां मनुष्य बलवान।
जहां मनुष्य बलिष्ठ है वहीं बैठा अहंकार।
सब कुछ वह धूमिल करके, छा देता अंधकार।।
अंधकार के होने पर, मानव करता है तत्व–बोध।
भूल–चुक धरणी पर धर के करता ज्ञान सत्य–शोध।।
जहां शोध है, वहीं है शुद्धि,
फिर उपजती मनीषी बुद्धि।
जिसके हैं अनेकों काम,
उन कामों में एक महत है,
जहां भजे यह राम–नाम!
राम–नाम से होता है सब कुछ का समाधान,
चाहें बरसे जेठ, अंगारे होता नहीं व्यवधान।
राम–नाम से होता ज्ञात, यह शरीर नश्वर है,
जहां मानव का एक न चलता वहीं सदा ईश्वर है।
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