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बिन बाप की गरीब धीया पर सामाजिक दृष्टि

                
                                                         
                            कोई कहता, गुलाब है वह
                                                                 
                            
तो कोई कहता,लाजवाब है वह
बेलिहाज–ए–उलफत की लिहाज है वह।

उसे न देखो इस कदर
दहलीज ए चौखट की हिजाब है वह।

लोग उसे क्यों निहारते हैं?
अपनी हवस भरी आंखों से,
बेसहारे बेजुबान मां की अल्फाज है वह।

हवस की भूखी दुनिया को,
यह बात कौन समझाए?
कि न समझे उसे अपनी जिस्म की भूख,
वह बहुत बेचारी है न कि शवाब है वह।

तरस न खाकर भी खेलते है उसके जिस्म से सभी
और कहते हैं बेमिसाल कवाब है वह
इन मौका परस्तों को कौन कहे?
न सोचें ऐसा,जैसा वो सोच रखते है
हर गरीब बेजुबां की अश्फाक है वह।

भले ही बांध के रख ली है,
गरीबी और जिस्म के भूखे लोगों ने
उसे अपनी बाहों में जकड़ कर
फिर भी अपनी बूढ़ी मां की आंखों का मेहराब है वह।
अपनी लाचार मां कि रुआब है वह ख़ाब है वह
बुढ़ापे की इकलौती लाठी और अंधेरे की चिराग है वह।
:–उत्तम मिश्र
 
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3 महीने पहले

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