पत्नी कोई वस्तु नहीं,
जिस पर क्रोध उतारा जाए,
वह तो जीवन की अर्धांगिनी है,
जिसे हर पल सम्मान दिलाया जाए।
जिस हाथ ने माँग सजाई,
उसी हाथ से मत चोट पहुँचाओ।
जिसने जीवन तुम्हें समर्पित किया,
उसका विश्वास मत टूटने दो।
याद रखो—
शक्ति किसी को रुलाने में नहीं,
शक्ति किसी को अपनाने में है।
महानता हाथ उठाने में नहीं,
झुककर सम्मान निभाने में है।
बुढ़ापा प्रेम की अंतिम ऋतु है,
इसे हिंसा से कलंकित मत करो।
जीवनसाथी का हाथ थामो,
उसे आँसू नहीं, मुस्कान दो।
झुर्रियों से ढका हुआ चेहरा,
सफ़ेद हुए जब बाल,
तब क्यों रिश्तों पर पड़ जाए,
क्रोध और हिंसा का जाल?
जिसने जीवनभर साथ निभाया,
हर सुख-दुख में हाथ थामा,
उसी जीवनसंगिनी पर क्यों,
उठता है अपमान का तमाचा?
यदि जीवनभर की आदत रही,
तो वह गन्दे संस्कार की देन है।
जो प्रेम की भाषा भूल गया,
उसका अपना चरित्र दाग़दार है।
यदि मन में अधिकार का नशा है,
और नियंत्रण की चाह बनी,
तो समझो प्रेम नहीं, केवल
अहंकार की दीवार ठानी है ।
यदि नशे ने विवेक हर लिया,
और इंसानियत खो बैठी,
तो दोष न उम्र का है इसमें,
गलती शिक्षा के राह की ठहरी।
बुढ़ापा तो वह समय है,
जब हाथ सहारे के लिए बढ़ते हैं,
न कि उसी हाथ से
अपने ही साथी के आँसू झरते हैं
-ऊषा शुक्ला
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