इस मिट्टी से मैं पैदा हुआ,
इस मिट्टी में खेलकर मैं बड़ा हुआ ।
इस मिट्टी से ही है मेरी पहचान,
क्योंकि मैं हूं इस मिट्टी की संतान।।
ना जाने कितने आए, कितने चले गए,
इस मातृभूमि के प्यार से रह गए अनजान ।
कुछ को यह मातृभूमि समझ नहीं आई ,
कुछ को यह मातृभूमि छोड़ नहीं पाई।।
घर से दूर रहने को था मैं मजबूर ,
क्योंकि मातृभूमि की रक्षा करना ही था मेरा नूर ।
फिर क्या मैं अपनी दास्तां खुद सुनाऊं ,क्या बतलाऊं, अब मैं तुम्हें यारों क्या दिखाऊं,
मैं मिल जाता हूं कभी श्मशान में ,तो कभी कब्रिस्तान में,
क्योंकि मैं हूं इस मातृभूमि का एक शहीद वीर जवान।।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X