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आशा के दीप जलाती ज़िन्दगी।

                
                                                         
                            ज़िन्दगी
                                                                 
                            
रेगिस्तान की धूप-सी तपती ज़िन्दगी,
कभी हँसाती, कभी रुलाती ज़िन्दगी।
पत्थरों में भी जिसने तराशा ख़ुदा,
ख़ुद से ही ख़ुद का परिचय कराती ज़िन्दगी।
हर ठोकर को सीढ़ी बनाना सिखाती,
गिरकर फिर से उठना सिखाती ज़िन्दगी।
धूप के बाद छाँव भी मिलती यहीं,
आशा के दीप जलाती ज़िन्दगी।
वक़्त की आँधियों में जो अडिग रही,
हौसलों को सँवारती ज़िन्दगी।
महरूम हूँ, मगर मगरूर नहीं,
आँसुओं में भी मुस्कराती ज़िन्दगी।
हर सफ़र का यही तो निचोड़ है, 'नीर'—
ख़ुद से ही पहचान कराती ज़िन्दगी।
-नीरजा वकील नीर
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2 घंटे पहले

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