राहों ने जब रोकना चाहा,
हौसला बोला—सवेरा मेरा भी है।
पत्थर जितनी दीवार बने,
उसमें छिपा रास्ता मेरा भी है।
हार अगर सामने खड़ी रही,
जीत का निश्चय मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
आँधी ने जब रुख़ मोड़ना चाहा,
रुख़ चुनने का हक़ मेरा भी है।
बादल चाहे सूरज ढककर हँसे,
मन का सवेरा मेरा भी है।
डर ने धरती से बाँधना चाहा,
उड़ने का साहस मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
सीमाओं ने जब राहें बाँधीं,
मगर ये हुनर मेरा भी है।
दरवाज़ों पर जब पहरे बैठे,
मगर मक़ाम मेरा भी है।
शक उनका भी अपनी जगह सही,
अटल ये यक़ीं मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
मंज़िल ने जब नींद चुराई,
जागने का सबब मेरा भी है।
थकान ने जब बाँहें पकड़ लीं,
क़दमों में फिर दम मेरा भी है।
आराम ने जब चादर बिछलाई,
मेहनत से गहरा रिश्ता मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
देर ने मुझको रोकना चाहा,
सब्र का दरिया मेरा भी है।
बीज चट्टानों में दबा रहा,
उसमें हरा इरादा मेरा भी है।
मंच कभी किसी की जागीर नहीं,
उसमें एक मक़ाम मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
वक़्त ने पीछे छोड़ा मुझको,
मगर अगला दौर मेरा भी है।
राख समझकर छोड़ गए जो,
उस राख में अंगार मेरा भी है।
बीता वक़्त भले उनका रहा,
आने वाला दौर मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
राह किसी की रोकूँ क्यों मैं,
आगे का सफ़र मेरा भी है।
जीत किसी की छीनूँ क्यों मैं,
जीतने का हुनर मेरा भी है।
ताज नहीं, पहचान है मंज़िल,
बस सम्मान का हक़ मेरा भी है।
मेरे पंखों को क़ैद मंज़ूर नहीं,
ये खुला आसमान मेरा भी है।
— संतोष कुमार शर्मा
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