मैं सोचता हूँ, मैं कौन हूँ ॥
एक कमरे में मौन हूँ , न जहाँ देखता न शबाँ देखता
मै कौन हूँ ।
मै सोचता हूं , मैकौन हूँ ।।
फिर देखता हूँ चारदीवारी को , ज्यो नजर पड़े पुस्तकों पर , त्यों सोचता हूँ , कौन हूँ ।
मै सोचता हूं , कि कौन हूँ ।।
मौन हूं , मै , शान या शौख हूं मै , या संत हूं।
मै सोचता हूं , मै कौन हूं ।।
इस दुनिया में मौन हूं मै , फिर सोचता हूं ,
कि प्रेम हूं , कि प्रीत हूं , कि मनमीत हूं मै ,
कौन हूँ मै।।
ज्योंही नजर पड़ी पतीले पर , त्यों मस्तिष्क आया क्षुधित हूं मै ।।
मै कौन हूँ , मै कौन हूं ।।
मै सोचता हु , मै कौन हूं
हूं मै एक, स:धरण सा लड़का , अपने गुरुजनों , परिजनों का प्रिय , सभ्य, साधारण सा विद्यार्थी।।
हूं मै चिराग अपने कुल का , हूं मै विशवास अपने पितरों का , हूं मै उम्मीद अपने परिजनों का , हूं मै सहारा अपने वृद्ध माता पिता का ।।
हूं मै तारणकर अपने पितरों का ।।
अभी हूं मै एक साधारण सा विद्यार्थी, जग रही है ज्योति इस कुल की अभी , अलख प्रकाशित होगा जिस दिन , सह सम्मान समर्पण को ,
मै कौन हूं , मै कौन हूं ।।
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