न्याय की खोज में सब निकल पड़े
महारथी खड़े थे बड़े-बड़े
सब एक से एक वीर थे
पर दिल के सब फकीर थे
द्रौपदी सबके सामने रोती रही
उसकी चीर हरण फिर भी होती रही
सभी वहां पर मौन खड़े थे
महारथी वे सब बहुत बड़े थे
न्याय का अब कैसे वास होगा
सर कटेगा या सर्वनाश होगा
गोविंद ने सर्वनाश को रोकना चाहा
इस युद्ध में पूरे ब्रह्मांड को नहीं झोंकना चाहा
कृष्ण की भी नहीं चली
लड़ने खड़े दोनो और बली
सब ने देखा युद्ध का विनाश
और था ही क्या किसी को इससे आस
फिर भी न्याय तो होना था
आखिर नारी को समझ लिया खिलौना था
सबने अपनी गलती की सजा पाई
न्याय की एक नई क्रांति छाई
त्रेता हो या फिर हो द्वापर युग
लड़ो खुद के लिए तभी मिलेगा सुख
कल युग की भी यही सीख है
प्यार से नहीं मिलता यहां भीख है
न्याय चाहिए तो लड़ो
आगे बढ़ो कभी ना डरो
अब न्याय की बारी है
गर तुम सच्चे हो तो जीत पक्की तुम्हारी है
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