वक़्त के आगे किसकी चलती
भोर की पहली किरण जगे तो,
रात के साए ढल जाते हैं।
फूल भले इतराएँ कितने,
साँझ ढले सब झर जाते हैं।
अटल खड़े पर्वत के सीने,
वक़्त पड़े तो हिल जाते हैं।
सूखी धरती छूते बादल,
सूने वन भी खिल जाते हैं।
पल भर में जब मंज़र बदले,
अपने भी चौंक जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
जिनके आगे कल तक दुनिया,
झुकते शीश नज़र आते हैं।
जिनकी एक झलक पाने को,
मेले रोज़ सज जाते हैं।
वक़्त अचानक करवट ले तो,
सारे रंग उतर जाते हैं।
ताक़त का जो गुरूर करें वे,
मिट्टी में मिल जाते हैं।
चाहे जितने ऊँचे हों वे,
आख़िर नीचे आते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
दौलत के ऊँचे महलों में,
चैन कहाँ सब पाते हैं।
सोने के बिस्तर पर भी तो,
लोग कई जग जाते हैं।
मुट्ठी में संसार दबाकर,
मन से हार भी जाते हैं।
खाली हाथ यहाँ हम आते,
खाली हाथ ही जाते हैं।
साथ हमारे कर्म ही चलते,
बाकी यहीं रह जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
दर्द अगर सीमा से बढ़ता,
आँसू मोती बन जाते हैं।
रात घनी हो जितनी लेकिन,
भोर के दीपक जल जाते हैं।
टूटी शाखों पर भी मौसम,
फूल नए फिर लाते हैं।
गिरकर जो फिर उठते साथी,
अपना भाग्य बनाते हैं।
वक़्त के मरहम से गहरे,
घाव सभी भर जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
सुख के मेले में तो साथी,
सौ-सौ हाथ बढ़ाते हैं।
दुख का पहला बादल छाए,
चेहरे दूर हट जाते हैं।
मन से मन का रिश्ता हो तो,
सब तूफ़ान गुजर जाते हैं।
मतलब पर टिकते जो नाते,
रेत-महल-से ढह जाते हैं।
वक़्त कसौटी बनकर आए,
सच्चे मित्र बच जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
आईना हर दिन चुप रहकर,
जीवन-सच दिखलाता है।
बचपन कब यौवन बनता है,
कौन भला यह पाता है।
काले बालों पर भी चाँदी,
वक़्त स्वयं धर जाता है।
चेहरा चाहे ढलता जाए,
अनुभव दीप जलाता है।
उम्र गुज़रती जाती लेकिन,
कुछ अफ़साने रह जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
बीते कल की कड़वी यादें,
आज का सुख ले जाती हैं।
आने वाले कल की फ़िक्रें,
मन में धुंध भर जाती हैं।
आज हथेली पर जो पल है,
वही ख़ज़ाना होता है।
वक़्त सँभाले जो जीवन में,
सुख का बीज वही बोता है।
कल पर सब कुछ छोड़ने वाले,
खाली हाथ रह जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
राह कठिन हो तो मत रुकना,
मुश्किल भी झुक जाती है।
छोटे कदम निरंतर बढ़ते,
मंज़िल पास चली आती है।
हार कभी अंतिम सच कब है,
बस आगे का इशारा है।
गिरकर फिर उठने वाला ही,
वक़्त की आँख का तारा है।
जो हालातों से लड़ते हैं,
वे इतिहास बन जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
वक़्त किसी से बैर न रखता,
कर्मों का फल देता है।
जैसा बीज धरा में बोओ,
वैसी फ़सलें देता है।
झुककर चलने वाला राही,
ऊँचे शिखर चढ़ जाता है।
अपने ही गुरूर में डूबा,
बीच सफ़र थक जाता है।
प्रेम बाँटकर जीने वाले,
जाकर भी रह जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
आज मिला है, आज सँवारो,
कल को किसने जाना है।
हर धड़कन की सीमित लय है,
हर साँसों को जाना है।
नाम नहीं, व्यवहार मनुज का,
याद सदा रह जाता है।
प्रेम भरा छोटा-सा दीपक,
सदियों तक जल जाता है।
वक़्त गुज़र जाता है लेकिन,
नेक निशाँ रह जाते हैं।
वक़्त के आगे किसकी चलती,
तख़्तो-ताज बदल जाते हैं॥
— संतोष कुमार शर्मा
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