वृक्षों की पुकार
आज फिर कोई जंगल की राहों में खड़ा है,
आँखों में विश्वास, हृदय में साहस बड़ा है।
वह केवल अपने लिए नहीं पुकारता,
धरती के भविष्य को बचाने निकल पड़ा है।
पेड़ आज भी मौन तपस्वी-से खड़े हैं,
धूप, वर्षा और आँधियों में अडिग खड़े हैं।
वे केवल लकड़ी नहीं, जीवन का विस्तार हैं,
धरती की साँसें, आने वाले कल का आधार हैं।
फिर कुछ हाथ तनों से लिपट गए,
मानो रिश्ते फिर प्रकृति से जुड़ गए।
उनकी निःशब्द पुकार यही कहती रही—
"जंगल बचेंगे, तभी सपने बचेंगे।"
सड़कें बनें, नगर भी आगे बढ़ें,
विकास के नए आयाम निरंतर गढ़ें।
पर वह प्रगति कैसी, वह सम्मान कहाँ,
जो हरियाली छीन ले, उजाड़ दे जहाँ?
नदियाँ प्रश्न हैं, पर्वत उत्तर खोजते हैं,
पक्षी हर सुबह हमसे कुछ पूछते हैं।
जो वृक्ष हमें जीवन का उपहार देते हैं,
उन्हें ही हम क्यों बार-बार खो देते हैं?
राष्ट्र की पहचान केवल भवनों से नहीं,
उसकी नदियों, वनों और पर्वतों से भी है।
सच्चा विकास वही कहलाएगा,
जो प्रकृति का हाथ कभी न छोड़ पाएगा।
आओ, एक संकल्प आज मिलकर करें—
हर वृक्ष के साथ जीवन का रिश्ता फिर से गढ़ें।
धरती हमें विरासत में नहीं मिली है,
इसे आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है।
— रत्नदीप नाथ
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