अँधेरों से लड़ते लोग, उजालों से डर जाते हैं,
जो दीपक राह में मिल जाए, उसे ही बुझा जाते हैं।
उलझनों की रात में अक्सर, अपने ही खो जाते हैं,
जो मरहम बनकर आए हों, उनसे ज़ख़्म छुपाते हैं।
दिल पर बोझ लिए फिरते हैं, आँखों में धुआँ समेटे,
फिर उसी धुएँ में अक्सर, अपने रिश्ते खो देते।
जो हाथ थामने आए हों, उनसे हाथ छुड़ा जाते हैं,
जो साथ निभाना चाहें, उनसे राह बदल जाते हैं।
जैसे काँटों से घायल पाँव, फूलों को ठुकराते हैं,
वैसे ही टूटे मन वाले, रिश्तों को मिटाते हैं।
कभी डर उन्हें खोने का, कभी ख़ुद के बिखरने का,
कभी भय रहता है दिल में, फिर से किसी के जुड़ने का।
इस डर में कितने उजले चेहरे, धुँधले हो जाते हैं,
और अपने ही हाथों इंसान, अपने अपनो को खो जाते हैं।
दोष उजाले का नहीं होता, आँखें जब नम होती हैं,
दीपक तो जलना चाहता है, पर खिड़कियाँ बंद होती हैं।
शायद कुछ लोग चाहते तो, रोशनी चुन सकते थे,
पर अपनी ही उलझनों में, अँधेरे चुनते हैं।
और जब रात गुज़रती है, तब इतना समझ में आता है—
जिस उजाले को दूर किया था, वही फिर याद आता है।
कुछ रिश्ते लौट नहीं पाते, चाहे कितनी पुकारें हों,
कुछ दीपक बुझ जाते हैं, चाहे कितनी बहारें हों।
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