आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तू मनहूस!

                
                                                         
                            दुनिया में आयी तो
                                                                 
                            
लड़की बनके आयी
पैदा होते ही
माँ को खा गई
तू मनहूस!

ज़रा बड़ी क्या हुई
तेरी वजह से
बाप की नौकरी छूट गई
तू मनहूस!

जैसे तैसे ब्याह दिया
मत पूछो कैसे भिड़ा दिया
पति पीता था दिन रात
सब तेरी वजह से
रोज़ पीटता था तुझे
सब तेरी वजह से
कितने दिन जीता बिचारा
खा गई उसको भी तू
तू मनहूस!

फिर ला पटका उन्होंने
तुझे हमारी चौखट
कर दिया तूने
जीवन हमारा चौपट
अरे धरती की बोझ!
कैसे संभालेंगे तुझे अब रोज
और उससे बड़ा रोग
क्या कहेंगे लोग
कुछ होता भी तो
नहीं तुझको
तू मनहूस!

सुना है नदी किनारे
रहती है तेरी जैसी
और भी मनहूस
जो
किसी का रास्ता नहीं काटती

जा तू भी वहीं जाकर
अपने कुनबे में जाकर मर
अच्छी तो खैर क्या होगी
बुरी भी मत देना खबर
तू मनहूस!

और फिर दुबारा
गलती से जो पैदा हो गई
तो लड़की मत बनना
अभी हम तैयार नहीं है
स्वीकार करने को
देवी, लक्ष्मी, माता को
या शायद इस लायक ही नहीं हैं
हम मनहूस!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर