तू चलता चल...
तू रुक नहीं, तू झुक नहीं,
हर मुश्किल से लड़ता चल।
विश्वास को अपना साथी बना,
तू चलता चल... तू चलता चल।।
माना डगर कठिन बहुत है,
काँटों से भरी हर राह।
मंज़िल उन्हीं के कदम चूमे,
जो छोड़ें नहीं कभी चाह।
तू चलता चल... तू चलता चल।।
अज्ञान का तम छाए यदि
ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर।
संघर्षों की अग्नि में तपकर,
स्वर्ण-सा अपना जीवन गढ़।
तू चलता चल... तू चलता चल।।
ठोकर को सीढ़ी बना ले,
सपनों को साकार कर।
जीत उसी की होती है,
जो हिम्मत से हर वार सहकर
तू चलता चल... तू चलता चल।।
-प्रतिमा तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X