धूल उड़ रही राहों पर, मैं ख़ामोश खड़ा रहा,
वक़्त का हर एक ज़रा, पानी सा बहता गया।
बहा ले गया किनारे कई, यह तुफ़ान-ए-रोज़गार,
पर रूही सन्नाटा मेरा, अपनी जगह पर जम सा गया।
कुछ साँसें आज की गिरवी रख, कुछ उम्मीदें उधार लेता हूँ,
ग़म-ए-दुनिया को थोड़ी देर, ताक़ पर रख देता हूँ।
ठहरो ज़रा, इस भागती दुनिया का हिसाब कल करूँगा,
कुछ देर मैं अपनी ही रूह की, मधुशाला हो आता हूँ।
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