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आँचल का साया

                
                                                         
                            देखा था रब जिसमें वो रब मुझसे क्यों रूठ गया,
                                                                 
                            
उम्मीदों की उस टूटन ने, हताशा का दामन थाम लिया।

आँचल का जो वो साया था ना जाने क्यों मुझसे छूट गया,
वो सिलवटें पड़ी हैं ना जाने क्यों हटती नहीं।

कच्ची मिट्टी सी थी मैं, वो पावक ही मुझसे रूठ गया,
सजती थी जो उस देह में पोशाक, संभाले रखा है।

जब-जब उम्मीदें अब मेरी हताशा से टकराती हैं,सच कहूँ माँ तेरी याद मुझे आती है।



 
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3 महीने पहले

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