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शिव का स्वरूप और धर्म का ढोंग

                
                                                         
                            माथे पर चंद्रमा, जटा में गंगा, अंग भस्म लपटाए हैं,
                                                                 
                            
मेरे भोले तो छल-प्रपंच से दूर, सहज मुस्कुराए हैं।
सावन आया, जल चढ़ाने की होड़ लगी है चारों ओर,
पर मन के भीतर झांक के देखो, क्या शांत हुआ है द्वेष का शोर?
जिस हिंदुत्व का अर्थ रहा है— 'वसुधैव कुटुंबकम' का भाव,
उसी धर्म के नाम पर आखिर क्यों रचते हो नित नए दुराव?
हाथ में झंडा, मुख में गाली, यह कैसी भक्ति का स्वरूप?
शिव तो करुणा के सागर हैं, तुम क्यों बनते भीषण रूप?
कांवड़ उठाई, शोर मचाया, पर राहगीर को त्रास दिया,
दूध बहाया सड़कों पर, पर भूखे को न अत्था दिया।
भोले भंडारी तो विष पीकर भी दुनिया को अमृत देते हैं,
तुम धर्म के नाम पर कड़वाहट घोल के कैसा पुण्य कमाते हो?
हिंदुत्व न सिखाता कटुता, न सिखाता है अंधकार,
यह तो सत्य, अहिंसा, संयम और प्रेम का है आधार।
जो चोट पहुँचाए इसकी साख को, चोला पहन अधर्म का,
वो भक्त नहीं, बस छलिया है, भूला है मर्म सत्य-कर्म का।
छोड़ो यह आडंबर सारा, मन को जरा शुद्ध कर लो,
भोलेनाथ बसते हैं वहीं, जहाँ प्रेम का घट भर लो।
सच्चा सावन तब आएगा, जब मन से मैल मिटाओगे,
शिव के सच्चे अनुगामी बन, जब जग को गले लगाओगे।
-अजीत अनुराग
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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