तुम्हारा रुमाल
(मेरी पोती नैयरा के नाम)
तुम्हारा रुमाल
अब भी छुपा है
मेरे तकिए के नीचे—
जैसे वक़्त की सिलवटों में
दबा कोई नर्म-सा लम्हा।
उस दिन
जब वक़्त बेरहम होकर गुज़रा,
तुम्हें मुझसे दूर ले गया—
मेरी मुट्ठी में रह गया
कपड़े का यह छोटा-सा टुकड़ा
और
कुछ अनकही खामोशियाँ।
कभी तो तुम लौटोगी,
इन धुँधली यादों की
पगडंडी पकड़कर—
और थाम लोगी इसे
उसी तरह,
जैसे बचपन में थामा करती थीं,
बिना किसी वजह,
सिर्फ़ साथ होने के लिए।
मुझे यक़ीन है—
तुम आओगी ज़रूर।
क्योंकि कुछ इंतज़ार
समय के साथ नहीं मिटते,
वे धीरे-धीरे
दुआ बन जाते हैं।
यह रुमाल
अब सिर्फ़ रुमाल नहीं—
तुम्हारी हँसी की
बची हुई गूँज है,
तुम्हारी बातों की
सहेजी हुई गर्माहट है,
और उस मासूम बचपन की
आख़िरी निशानी,
जो बीतकर भी
मेरे भीतर
अब तक महक रही है।
मेरी प्यारी पोती,
तुम दूर होकर भी
मेरी स्मृतियों के आँगन में
हर पल खेलती रहती हो;
तुम्हारा यह छोटा-सा रुमाल
आज भी
मेरी गोद में
तुम्हारी मौजूदगी-सा लगता है।
-नीरजा वकील नीर
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