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स्वयं तक सिमटता जीवन

                
                                                         
                            निर्जन पथ सूना डेरा,
                                                                 
                            
गहराता सन्नाटा घेरा।
नयन नीरव व्यथा ढोए,
व्यर्थ जग को कौन रोए॥

अंतर की पीड़ा न डोले,
रुद्ध कपाट कौन खोले।
मौन आवरण ओढ़े,
दृग सभी नाते क्यों तोड़े॥

शून्यता का विस्तार भारी,
घेरती घनघोर अंधियारी।
स्वयं तक सिमट कर जीना,
भाग्य की रेखा निराली॥

चलते अनन्त डगर पर,
साया भी मुँह मोड़े सफर पर।
दर्द अपना स्वयं ही सहना,
अश्रु पलकों पे चुपचाप धरना॥
-राकेश कुमार तिवारी 
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एक घंटा पहले

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