जो कहते यह स्वार्थी नहीं हम
वही दिखाते सब स्वार्थ।
शब्द रूपी वाण से ,
भेदे दिल के द्वार।
धन- दौलत है सभी को भाये,
झूठ कहते सब खेल।
खेल - खेल में कर जाते,
स्वार्थी धन- दौलत से मेल।
प्रेम, दया क्या होता है?
सब हो गया बकवास।
बस स्वार्थ के चल पड़ा,
झूठा सा एक परिवार।
मतलब के बस मधुर बोले,
जैसे हो वो सबसे खास।
सुख में साथ सभी है देते,
दुःख में छोड़े सब हाथ ।
है दौलत तो साथ हैं देते,
जैसे हो वो भगवान।
सुराख जेब में सुनते ही,
छोड़े उन सब का साथ।
सिक्के तो है बाद में गिरते,
पहले रिश्ते गिरते है।
धन - दौलत के लोभ में जुड़ते,
इसके गिरते ही गिरते हैं।
-नेहा राज
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