मुश्किल तो सौ ज़हर के घूँट हँसकर पी जाना था,
भरी सभा में सब्र का वो बांध बनाए रखना था,
हाँ ! कृष्ण होना इसी का नाम था।
सुदर्शन उठाना आसान था ।।
पर हम तो मिट्टी के बने मामूली इंसान हैं,
न हमारे सीने में वो समंदर सा सब्र है,
न उँगलियों पर इंसाफ़ करने का कोई चक्र है।
किसी मूर्ख और मर्यादाहीन की बातें
अगर यूँ ही दिल पर लेते रहे,
फिर तो उसका सर फोड़ेंगे,
या ग़ुस्से में अपना ही लहू जलाएँगे।
इसलिए बेहतर यही समझा मैंने,
कि न अब किसी की सौ ग़लतियों तक गिनती गिननी है,
न एक सौ एकवीं पर हिसाब चुकता करना है।
जहाँ सामने वाला सिर्फ़ ज़हर उगलने पर उतर आए,
वहाँ से ख़ामोशी से अपना दामन बचाकर निकल जाना है।
सबसे बड़ी समझदारी...
और सुकून का असली यही सुदर्शन चक्र है ।।
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